Thursday, July 31, 2008

आज सोचा जिंदगी को इक नया मोड़ दूँ
आंखें कब से मेरी सूनी हैं उन्हें ख्वाब कुछ और दूँ।
राह मैं चलते लोग तो कई मिल जाते हैं,
कुछ रुकते हैं, कुछ यूँही साथ से गुज़र जाते हैं।
क्योँ न मैं भी रूककर उन थामे हुए कदमों पे गौर दूँ
सब से भाग लिया बहुत, अब ज़रा ख़ुद को किस्मत पे छोड़ दूँ।

- स्मृती



1 comment:

Anonymous said...

Good to see you delving within through your poetic self.

Just one thing I would like to share though. Read your works time and again in future, and try to comprehensively grasp the road(which was sub-conscious then), that led you to this creation.

The most sublimate of all experiences I can recollect.....
- Rohin